रानी लक्ष्मी बाई की पुण्यतिथि पर विशेष रचना..!
-----रानी लक्ष्मीबाई-----
झांसी की रानी याद रहा
भारत के अमर वीरों में इनका
अलग ही एक इतिहास रहा
भागीरथी और मोरोपंत ने
भारत को ऐसा संतान दिया
मोरोपंत को भूल गए पर
मणीकर्णीका याद रहा
एक बाला थी बेहद सुंदर
विलक्षण प्रतिभा थी जिसके अन्दर
वात्सल्य प्रेम से दूर रही पर
देश प्रेम की ज्वाला में तपकर
तलवार, बन्दूक, घुड़सवारी
बचपन से ही शौक है पाले
उस बाला की कौशल देखकर
गंगाधर भी हुए दिवाने
व्याह हुआ फिर झांसी गई
अंग्रेजो से करी लड़ाई
अपनों ने जब साथ है छोड़ा
नाना,टोपे को फिर साथ है लाई
सन् ५७ का बर्ष था यह
पुरे देश में मची लड़ाई
रानी ने मर्दीनी बनकर
झांसी की थी लाज बचाई
पीठ पे लाडला लगाम मुॅह में
दोनों हाथ तलवार चलाई
साथ ना मिला जीवाजी का
फिर भी अंग्रेजों को चने चबवाई
फिर खाकर सर पे तलवार
मुर्छीत होकर गिर पड़ी
और देश की रक्षा राह में
एक और वीर की बलि पड़ी
जीवन भले ही अल्प था इनका
इतिहास इक लम्बा रच डाली
सैकड़ों अंग्रेजी सेना पर
एक मर्दानी थी भारी..!
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देश को संवारने में,
योगदान जिसका मिला।
भारत की एकता को,
स्वप्न दान जिसका मिला।
ऐसे महापुरुष को
कितने है पहचानते,
नाम कुछ को याद है पर,
काम सब नही जानते।
कहते है जिगर था लोहे का,
थी फौलादी इच्छा शक्ति।
पर देश प्रेम से बढ़कर वो,
न कर पाया एक की भक्ति।
रहे गुमनामी में खोए कुछ दिन,
अब उनको है नाम मिला।
बारडोली सत्याग्रह से,
हमको एक सरदार मिला।
562 रियासतों को मिलाकर,
भारत को है एक किया।
हैदराबाद, जूनागढ़ ने जब,
कर डाला बगावत था।
न हो ये भारत में शामिल,
उनका ये खिलाफत था।
तब दम भरा उसने शासन का,
दोनो को भारत में मिला दिया।
जूनादढ़ और हैदराबाद के,
नवाबों को भी हिला दिया।
J&k भी न होता प्रबल,
होता वह भी पूरा सबल,
गर सरदार की नीति चल जाती।
पर खेल हुआ उसमे भारी,
गांधी, नेहरू ने अड़ा दिया।
सरदार की इस फौलादी नीति को,
कश्मीर में आकर गिरा दिया।
हश्र हुआ क्या फिर सबने देखा,
लोग चुन-चुन मारे जाते थे।
निरपक्षता की चादर ओढ़कर,
कहां बचा हम पाते थे।
आई बारी जब सोमनाथ की,
पटेल ने ही अंजाम दिया।
अपने दम पर इस मंदिर को,
एक नया मुकाम दिया।
विरोध हुआ शासन में भारी,
सब को खुद पर झेल लिया।
सोमनाथ नवनिर्माण कराकर,
संस्कृति बेमिसाल दिया।
इस महामानव के बल पर ही,
है हिंदुस्तान।
वरना होता खंड - खंड,
न रहता अपना कोई निशान।
यूं ही नहीं होता कोई लौहपुरुष,
कीमत चुकानी पड़ती है।
भारत माता की सेवा में,
जीवन बितानी पड़ती है।
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मानवता क्यूं बिक रही है,
पैसों के बाज़ार में।
नैतिकता का मूल्य नहीं है,
आज के व्यापार में।
आपदा में हैं अवसर ढूंढो,
ऐसी सोच है जबसे आई।
लोगों ने तो भाव बदल ली,
करने लगे कमाई।
जैसे ही लाचार दिखे,
की बस उनको ही लूट लिया।
आफत में हैं जान जिसकी,
कहां उनको है छूट दिया।
खबर ऐसी ही हर जगह से,
बयां होती अखबार में।
मानवता क्यूं बिक रही है,
पैसों के बाज़ार में।
नैतिकता का मूल्य नहीं है,
आज के व्यापार में।
पानी से लेकर सांसों तक,
सबकी कीमत है तय हुई।
पर वो कहां सुनने वाले,
है जिसकी आत्मा मरी हुई।
उनको तो बस पैसा प्यारा,
बांकी जाए भाड़ में,
मानवता क्यूं बिक रही है,
पैसों के बाज़ार में।
नैतिकता का मूल्य नहीं है,
आज के व्यापार में।
हमने जिसको देव है माना,
अपने रब से बढ़कर जाना
उसने ही क्या सिला दिया,
अस्पताल में आते ही।
परिजनों को रुला दिया।
बेड भी बेचा दवा भी बेची,
है पेशे को ही बेच दिया।
और कुछ न मिला जब तो,
लाशों को भी बेच दिया।
हमने जलाए थे दिये और,
बजाई थी थाली जिसके सम्मान में।
मानवता क्यूं बिक रही है,
पैसों के बाज़ार में।
नैतिकता का मूल्य नहीं है,
आज के व्यापार में।

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