दहेज प्रथा और संयुक्त परिवार..!
दहेज है एक दानव रूपी शब्द,
हो जाते है सब इस पर निशब्द
दहेज में तो तनया है रोती
सब करो इसे,
अभी के अभी बन्द।।
दहेज के बदले शिक्षित कन्या लो,
ताकि घर में बोले वो,
संस्कारो के दो बोल।
वधु पर तुम मत करो अत्याचार
क्यूंकि, दिया किसी ने तुम्हे रत्न अनमोल।।
आज बहू बन जो दहेज के लिए उत्पीड़ित होती,
कभी वो अपने मैया के सीने लगकर थी सोती।
दहेज के लिए तुम कर,
उस पर बेचारी पर अत्याचार,
अनजाने में अपने जन्मों की
करते तुम लीपापोती ।।
पापा के घर की वो लाड़ली,
आंगन में चहकते कूदते थी वो रहती ।
आज वही बहू बन दहेज के नाम पर,
घुघंट में चेहरे ढककर है वो रोती।।
बन्द करो तुम, अब बन्द करो,
बेटों की सौदादारी, तुम बन्द करो।
दहेज में तो है तनुजा है जलती,
इसलिए ये कलाकारी,
तुम अब बन्द करो।।
कन्या तुम भी अब,
बहू से बेटी भी बन जाओ,
पति के सिवा तुम ,
सास ससुर को भी अपनाओ।
ननद को ननद नहीं,
बहन के रूप मे तुम पहचानो,
देवर को देवर रूप नहीं,
भाई रूप में मानो।
नारी तुम भी दिलसे,
ससुराल मायका भेद मिटाओ।
अपने कर्तव्यों रूपी गुणों से तुम
संयुक्त परिवार में तुम छा जाओ।।
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शिक्षा..!
दहेज है एक दानव रूपी शब्द, हो जाते है सब इस पर निशब्द
दहेज में तो तनया है रोती
सब करो इसे,
अभी के अभी बन्द।।
दहेज के बदले शिक्षित कन्या लो,
ताकि घर में बोले वो,
संस्कारो के दो बोल।
वधु पर तुम मत करो अत्याचार
क्यूंकि, दिया किसी ने तुम्हे रत्न अनमोल।।
आज बहू बन जो दहेज के लिए उत्पीड़ित होती,
कभी वो अपने मैया के सीने लगकर थी सोती।
दहेज के लिए तुम कर,
उस पर बेचारी पर अत्याचार,
अनजाने में अपने जन्मों की
करते तुम लीपापोती ।।
पापा के घर की वो लाड़ली,
आंगन में चहकते कूदते थी वो रहती ।
आज वही बहू बन दहेज के नाम पर,
घुघंट में चेहरे ढककर है वो रोती।।
बन्द करो तुम, अब बन्द करो,
बेटों की सौदादारी, तुम बन्द करो।
दहेज में तो है तनुजा है जलती,
इसलिए ये कलाकारी,
तुम अब बन्द करो।।
कन्या तुम भी अब,
बहू से बेटी भी बन जाओ,
पति के सिवा तुम ,
सास ससुर को भी अपनाओ।
ननद को ननद नहीं,
बहन के रूप मे तुम पहचानो,
देवर को देवर रूप नहीं,
भाई रूप में मानो।
नारी तुम भी दिलसे,
ससुराल मायका भेद मिटाओ।
अपने कर्तव्यों रूपी गुणों से तुम
संयुक्त परिवार में तुम छा जाओ।।
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शिक्षा..!
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झरना..!
नदियों का बाल्य रूप है झरना,
है पथ पर इसको निरंतर चलना।।
स्वच्छ निर्मल मृदुल जल लिए,
झर-झर करके है आगे बढ़ना।।
पहाड़ों से ये टकराती है,
अपना मार्ग खुद ही बनती है।
जीवन के हर पल, हर क्षण में,
संघर्ष हमको सिखलाती है।।
ऊँचें पर्वतों से इसका गिराना,
गिरकर झर-झर करके चलना।
सच में जीवन मार्ग हेतु,
बहुत कुछ बतलाती ये झरना।।
प्यासा चाहे इसके स्वच्छ जल से,
अपनी प्यास बुझाना।
प्रेमी चाहे झरने में,
प्रेमिका को अपनी बाहो में भरना ।।
नव-युगलों में प्रेम जगाती झरना,
कविता में सौंदर्य भरती झरना।
जीवन नीति सिखाकर हमको,
खुद नदियों में समा जाती झरना।।

